*धर्ममूर्ति बाबूजी सुशील कुमार सरावगी जिंदल जी के चरणों में शब्द-पुष्प*
_राष्ट्रीय अध्यक्ष, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय विचार मंच, नई दिल्ली_
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*समाज का दीप, संस्कारों का स्तम्भ*
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो पद से नहीं, बोध से पहचाने जाते हैं। जिनकी वाणी में शास्त्र की गंभीरता और व्यवहार में माँ जैसी ममता एक साथ बहती है। ऐसे ही एक नाम है – *हिन्दू रत्न बाबूजी सुशील कुमार सरावगी जिंदल जी*।
आपका जीवन केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं, अपितु *सनातन मूल्यों की चलती-फिरती पाठशाला* है। दिल्ली की भागदौड़ के बीच भी जब आप बोलते हैं, तो लगता है जैसे किसी ऋषि-परंपरा की आवाज़ आज के शब्दों में उतर आई हो।
*1. चिंतन: समय से आगे की दृष्टि*
जब समाज ‘करियर या परिवार’ की बहस में उलझा था, आपने _“आने वाला समय कुवांरेपन का युग होगा”_ कहकर खतरे की घंटी भी बजाई और समाधान का सूत्र भी दिया – _23-26 वर्ष की आयु, परिवार-समाज-व्यक्ति का संतुलन_। आपने डराया नहीं, जगाया।
जब लोग रिश्तों को बोझ समझने लगे, आपने याद दिलाया – _“विवाह दुनियावी बंधन नहीं, सभ्यता और संस्कार को आगे बढ़ाने का स्तम्भ है”_। आपकी दृष्टि आँकड़ों तक सीमित नहीं, आत्मा तक जाती है।
*2. वाणी: अनुभव से निकले सूत्र*
आपके उद्बोधन छोटे होते हैं, प्रभाव बड़े।
_“किसी के लिए खुली किताब मत बनो... मतलबी दौर है”_ – यह पंक्ति आज के युवा को आत्म-सम्मान और विवेक दोनों सिखा देती है।
_“हर परिस्थिति कुछ सिखा जाती है, कोई धैर्य देता है कोई दिशा”_ – यह सूत्र गीता का सार 2 लाइन में उतार देता है।
_“तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो”_ – बचपन की प्रार्थना का मर्म आपने तब समझाया जब रिश्ते बिछड़ गए। आपने बताया कि अंत में रह जाता है केवल भगवान से रिश्ता।
आप जीव की तुलना आवारा कुत्ते से करके अहंकार पर चोट करते हैं, और शरणागत को मालिक की गोद में बैठा कुत्ता कहकर भक्ति का माधुर्य समझाते हैं। इतना सरल, इतना गहरा – यह बाबूजी की शैली है।
*3. कर्म: विचार से आगे संगठन*
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय विचार मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में आपने *राष्ट्र-धर्म-संस्कृति* को एक मंच पर लाने का कार्य किया। महिला प्रकोष्ठ अधिवेशन 2026 हो, या अक्षय तृतीया का संदेश – हर जगह आपका आह्वान यही रहता है: _“शिक्षा + संस्कार, करियर + परिवार, आत्मा की शुद्धि + बाहरी ढांचे की सुरक्षा”_।
आपने 108 नियमों के माध्यम से सनातन की दिनचर्या घर-घर पहुँचाई। एक इष्ट, एक मंत्र, एक समय – से लेकर गौ-सेवा, गंगा-स्नान, राम-नाम तक – आप धर्म को क्लिष्ट नहीं, *जीवन-योग्य* बनाते हैं।
*4. व्यक्तित्व: कठोर पर करुण*
आपकी भाषा कभी-कभी चेतावनी देती है – _“समय रहते न चेते तो तीन पीढ़ी बाद ताऊ-चाचा-बुआ का रिश्ता लुप्त हो जाएगा”_। पर उस चेतावनी के पीछे छिपी है वात्सल्य की तड़प। आप समाज को डाँटते नहीं, सहेजते हैं। जैसे पिता संतान को राह से भटकते देख टोक देता है।
*आज का प्रण*
बाबूजी, आपके उद्बोधन सुनकर हम केवल ‘वाह-वाह’ करके नहीं रह सकते। हमें आपके बताए _‘संतुलन के मार्ग’_ पर चलना होगा।
1. *युवा* – करियर बनाएँ, पर विवाह-परिवार को ‘बाद में’ की लिस्ट में न डालें।
2. *परिवार* – बच्चों पर दबाव नहीं, संवाद करें। ‘या तो’ की जगह ‘और’ का मॉडल अपनाएँ।
3. *समाज* – एकल परिवार को एकाकी न बनने दें। मोहल्ले, मंच, मंदिर – रिश्ते जोड़ने के केंद्र बनें।
आपने कहा था: _“आत्मा की शुद्धि ही सच्चा जीवन है, पर बाहरी ढांचे – परिवार – को बचाना भी जरूरी है”_। हम वचन देते हैं कि इस ढांचे की एक-एक ईंट को गिरने नहीं देंगे।
*अंत में प्रार्थना*
हे मातृशक्ति, बाबूजी सुशील कुमार सरावगी जिंदल जी को दीर्घायु, स्वस्थ काया और अखंड वाणी प्रदान करो, ताकि उनकी चेतना की मशाल युगों तक अंधकार मिटाती रहे।
आपके 9414402558 पर जब भी घंटी बजती है, किसी न किसी के जीवन में सवेरा हो जाता है।
*जय श्री राम | जय सनातन धर्म | जय मातृशक्ति | जय परिवार* 🌼
*जय हो धर्ममूर्ति बाबूजी की* 🙏🏻
_– एक श्रद्धावान कार्यकर्ता की कलम से_
_अक्षय तृतीया, 20 अप्रैल 2026_
+91-9024234521, 9414402558
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